आजादी के लिए गांधी जी के चलाए पांच आंदोलन

आजादी के लिए गांधी जी के चलाए पांच आंदोलन

गांधीजी के प्रमुख आंदोलन:

असहयोग आंदोलन (1920-1922):

असहयोग आंदोलन भारत में 1920 से 1922 तक चला एक अहिंसक जन आंदोलन था, जिसकी शुरुआत महात्मा गांधी ने की थी। इस आंदोलन का उद्देश्य ब्रिटिश सरकार के खिलाफ भारतीयों के असंतोष को व्यक्त करना और भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराना था।

आंदोलन के मुख्य बिंदु
  • स्कूलों, कॉलेजों और अदालतों का बहिष्कार
  • विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार
  • स्वदेशी उद्योगों को बढ़ावा देना
  • अहिंसक विरोध प्रदर्शन और नागरिक अवज्ञा
आंदोलन की शुरुआत
असहयोग आंदोलन की शुरुआत 1 अगस्त 1920 को हुई थी। इस दिन गांधी जी ने कलकत्ता में एक भाषण दिया, जिसमें उन्होंने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ अहिंसक प्रतिरोध के लिए भारतीयों को आमंत्रित किया।
आंदोलन का प्रसार
असहयोग आंदोलन पूरे भारत में तेजी से फैल गया। स्कूलों और कॉलेजों में छात्रों ने बहिष्कार किया, अदालतों में वकीलों ने वकालत छोड़ दी, और लोगों ने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया।
आंदोलन के परिणाम
असहयोग आंदोलन ने भारत में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ एक नई चेतना पैदा की। इसने भारतीयों को यह दिखाया कि वे अहिंसा के माध्यम से अपने अधिकारों के लिए लड़ सकते हैं।
आंदोलन की समाप्ति
21 फ़रवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के चौरी चौरा में एक भीड़ ने पुलिस स्टेशन पर हमला कर दिया और आग लगा दी। इस घटना में 22 पुलिसकर्मी मारे गए। गांधी जी ने इस घटना को अस्वीकार्य बताया और उन्होंने 12 मार्च 1922 को असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया।
आंदोलन का प्रभाव
असहयोग आंदोलन भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इस आंदोलन ने भारतीयों में राष्ट्रवाद की भावना को मजबूत किया और ब्रिटिश सरकार को भारत से अपनी सत्ता छोड़ने के लिए मजबूर करने में मदद की।
विस्तृत विवरण
असहयोग आंदोलन की शुरुआत 1 अगस्त 1920 को हुई थी। इस दिन गांधी जी ने कलकत्ता में एक भाषण दिया, जिसमें उन्होंने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ अहिंसक प्रतिरोध के लिए भारतीयों को आमंत्रित किया। उन्होंने कहा कि भारतीयों को स्कूलों, कॉलेजों और अदालतों का बहिष्कार करना चाहिए, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना चाहिए, और स्वदेशी उद्योगों को बढ़ावा देना चाहिए।
गांधी जी के आह्वान का भारतीयों ने गर्मजोशी से स्वागत किया। पूरे भारत में स्कूलों और कॉलेजों में छात्रों ने बहिष्कार किया, अदालतों में वकीलों ने वकालत छोड़ दी, और लोगों ने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया।
असहयोग आंदोलन ने भारत में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ एक नई चेतना पैदा की। इसने भारतीयों को यह दिखाया कि वे अहिंसा के माध्यम से अपने अधिकारों के लिए लड़ सकते हैं।
आंदोलन के परिणामस्वरूप, ब्रिटिश सरकार ने आने वाले दो साल में आंदोलन के तहत किए गए आक्रमण को रोकने के लिए योजना बनाई। सरकार ने भारतीय नेताओं को गिरफ्तार किया, और आंदोलन को दबाने के लिए सेना का इस्तेमाल किया।
21 फ़रवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के चौरी चौरा में एक भीड़ ने पुलिस स्टेशन पर हमला कर दिया और आग लगा दी। इस घटना में 22 पुलिसकर्मी मारे गए। गांधी जी ने इस घटना को अस्वीकार्य बताया और उन्होंने 12 मार्च 1922 को असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया।
असहयोग आंदोलन भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इस आंदोलन ने भारतीयों में राष्ट्रवाद की भावना को मजबूत किया और ब्रिटिश सरकार को भारत से अपनी सत्ता छोड़ने के लिए मजबूर करने में मदद की।
 नमक सत्याग्रह भारत में 1930 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में चलाया गया एक अहिंसक सविनय अवज्ञा आंदोलन था। इस आंदोलन का उद्देश्य ब्रिटिश सरकार के नमक कानून का उल्लंघन करके ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीयों के असंतोष को व्यक्त करना था।
आंदोलन की शुरुआत
नमक सत्याग्रह की शुरुआत 12 मार्च 1930 को हुई थी। इस दिन गांधी जी ने साबरमती आश्रम से दांडी तक 24 दिन के मार्च की शुरुआत की। इस मार्च में गांधी जी के साथ 78 अनुयायी शामिल थे।

आंदोलन का प्रसार
गांधी जी के दांडी मार्च के बाद, पूरे भारत में नमक सत्याग्रह का प्रसार हुआ। लाखों लोगों ने नमक कानून का उल्लंघन किया और बिना सरकार से अनुमति के नमक बनाया।
आंदोलन के परिणाम
नमक सत्याग्रह ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ भारतीयों के प्रतिरोध को एक नई ऊंचाई पर पहुंचाया। इस आंदोलन ने ब्रिटिश शासन को भारत से अपनी सत्ता छोड़ने के लिए मजबूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
विस्तृत विवरण
12 मार्च 1930 को, गांधी जी ने साबरमती आश्रम से दांडी तक 24 दिन के मार्च की शुरुआत की। इस मार्च में गांधी जी के साथ 78 अनुयायी शामिल थे। मार्च के दौरान, गांधी जी ने लोगों से ब्रिटिश सरकार के नमक कानून का उल्लंघन करने और बिना सरकार से अनुमति के नमक बनाने का आह्वान किया।
गांधी जी का मार्च 6 अप्रैल 1930 को दांडी में पहुंचा। दांडी पहुंचने के बाद, गांधी जी ने समुद्र के पानी से नमक बनाया। इस घटना ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ भारतीयों के विरोध को एक नई ऊंचाई पर पहुंचाया।
नमक सत्याग्रह के बाद, पूरे भारत में नमक सत्याग्रह का प्रसार हुआ। लाखों लोगों ने नमक कानून का उल्लंघन किया और बिना सरकार से अनुमति के नमक बनाया। ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए सेना का इस्तेमाल किया, लेकिन आंदोलन को रोकने में विफल रही।
नमक सत्याग्रह ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ भारतीयों के प्रतिरोध को एक नई ऊंचाई पर पहुंचाया। इस आंदोलन ने ब्रिटिश शासन को भारत से अपनी सत्ता छोड़ने के लिए मजबूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आंदोलन का प्रभाव
नमक सत्याग्रह भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इस आंदोलन ने भारतीयों में राष्ट्रवाद की भावना को मजबूत किया और ब्रिटिश सरकार को भारत से अपनी सत्ता छोड़ने के लिए मजबूर करने में मदद की।
नमक सत्याग्रह के कुछ प्रभाव निम्नलिखित हैं:
  • इस आंदोलन ने भारतीयों में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ एक नई चेतना पैदा की।
  • इस आंदोलन ने भारतीयों को यह दिखाया कि वे अहिंसा के माध्यम से अपने अधिकारों के लिए लड़ सकते हैं।
  • इस आंदोलन ने ब्रिटिश सरकार को भारत से अपनी सत्ता छोड़ने के लिए मजबूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
नमक सत्याग्रह भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। इस आंदोलन ने भारतीयों में राष्ट्रवाद की भावना को मजबूत किया और ब्रिटिश सरकार को भारत से अपनी सत्ता छोड़ने के लिए मजबूर करने में मदद की।

भारत में दलित आंदोलन की शुरूआत ज्योतिराव गोविंदराव फुले के नेतृत्व में हुई। इन्होने भारतीय समाज में दलितों को एक ऐसा पथ दिखाया था जिसपर आगे चलकर दलित समाज और अन्य समाज के लोगों ने चलकर दलितों के अधिकारों की कई लड़ाई लडी। यूं तो ज्योतिबा ने भारत में दलित आंदोलनों का सूत्रपात किया था लेकिन इसे समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का काम बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर ने किया। दलित शब्द सबसे पहले ज्योतिराव फुले द्वारा दलित वर्गों या हिंदू के अस्पृश्य जातियों के लिए इस्तेमाल किया गया था। महात्मा गांधी ने इन्हें हरिजन कह कर संबोधित किया था जिसका मतलब है भगवान् के संतान‘।
स्वतंत्रता से पहले भारत में जाति और दलित आंदोलन, ब्राह्मणवाद के सामाजिक और राजनैतिक प्रभुत्व के खिलाफ किया गया आंदोलन था। ब्राह्मणवाद के अनुसार, दलित या निम्न जाति के लोग केवल  तीन वर्णों जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की सेवा के लिए ही जन्म हुआ है, इसलिए उन्हें उच्च शिक्षा लेने का अधिकार नहीं है और नाही उन्हें सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक कार्यो में लिप्त होने का कोई अधिकार नहीं है।

    • महात्मा गांधी ने छुआछूत के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत की, जिसमें उन्होंने आत्मशुद्धि के लिए उपवास किया.
    • इस आंदोलन के अंतर्गत, गांधी जी ने छुआछूत के लोगों के लिए ‘हरिजन’ नाम का उपयोग किया और उनके समाज में समानता की बढ़ोतरी के लिए कई प्रयास किए.
    • इस आंदोलन का उद्देश्य छुआछूतों के लिए समाज में समानता और अधिकार की आवश्यकता को जगह दिलाना था.
आजादी से पहले भारत में दलित आंदोलनो की सूची
आंदोलन
संस्थापक
कारण और परिणाम
नायर आंदोलन
सी.वी रमन पिल्लई, के. राम कृष्ण पिल्लई और एम. पद्मनाभ पिल्लै के नेतृत्व में 1861 में शुरू हुआ।
1. ब्राह्मण्यवादी के प्रभुत्व के खिलाफ किया गया आंदोलन था।
2. मलयाली स्मारक 1891 में रमन पिल्लई द्वारा निर्माण किया गया था और 1914 में पद्मनाभ पिल्लै ने नायर सर्विस सोसाइटी की स्थापना की थी।
सत्यशोधक आंदोलन
ज्योतिराव फुले के नेतृत्व में 1873 में शुरू हुआ।
1. निम्न जातियों, अछूतों और विधवाओं के मुक्ति के लिए किया गया आंदोलन।
2. ब्राह्मण्यवादी के प्रभुत्व के खिलाफ किया गया आंदोलन था।
कैवर्तस आंदोलन
कैवर्तस द्वारा शुरू किया गया
1. 1897 में जाति निर्धारिणी सभा की नींव रखी गयी थी।
2. 1901 में महिषा समिति की नींव रखी गयी थी।
जस्टिस पार्टी मूवमेंट
1916 में डॉ. टी.एम. नायर, पी. टायगाराजा चेट्टी और सी एन मुदलायर के नेतृत्व में शुरू हुआ था।
1. सरकारी सेवाओं, शिक्षा और राजनीति में ब्राह्मणों के प्रभुत्व के खिलाफ हुआ आंदोलन था।
2. दक्षिण भारतीय लिबरेशन फेडरेशन (एसआईएलएफ) का गठन 1916 में किया गया था।
3. समूहों के लिए आरक्षण देने के लिए 1930 के सरकारी आदेश को पारित करने के प्रयास किए गए थे।
स्व-सम्मान आंदोलन
1925 में ई.वी रामास्वामी नायक या पेरियार के नेतृत्व में शुरू हुआ था।
1. जाति व्यवस्था और पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण के खिलाफ ब्राह्मणों के खिलाफ किया गया आंदोलन था।
2. कुड़ी अरासु पत्रिका 1910 में पेरियार द्वारा शुरू किया गया था।
वंचित वर्ग आंदोलन (महार आंदोलन)
1924 में बी.आर अंबेडकर के नेतृत्व में शुरू हुआ था।
1. वंचित वर्ग के उत्थान के लिए किया गया आंदोलन।
2. अस्पृश्यता के खिलाफ किया गया आंदोलन।
3. वंचित वर्ग संस्थान 1924 में स्थापित किया गया था।
4. बहिस्कृत भारत नमक पत्रिका मराठी भाषा में 1927 में शुरू की गयी थी।
5. 1927 में समाज समित संघ की स्थापना हुयी थी।
6. 1942 में अनुसूचित जाति संघ की स्थापना जिसने वंचित वर्गों पर अपने विचारों को प्रचारित किया।
कांग्रेस हरिजन आंदोलन
कांग्रेस
1. निम्न और पिछड़े वर्गों की सामाजिक स्थिति को ऊपर उठाने के लिए किया गया आंदोलन था।
2. 1932 में अखिल भारतीय अश्पृश्यता विरोधी संगठन की स्थापना की गयी थी।
3. महात्मा गांधी ने 1933 में हरिजन नामक साप्ताहिक की शुरुवात की थी।

भारत छोड़ो आंदोलन (1942):

भारत छोड़ो आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सबसे महत्वपूर्ण आंदोलन था। इस आंदोलन की शुरुआत 8 अगस्त, 1942 को महात्मा गांधी ने की थी। इस आंदोलन का उद्देश्य भारत से ब्रिटिश शासन को समाप्त करना था।

इस आंदोलन की शुरुआत के समय, भारत द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश साम्राज्य का एक सहयोगी था। महात्मा गांधी का मानना था कि भारत को ब्रिटिश साम्राज्य से स्वतंत्र होने का यह सबसे अच्छा अवसर था। उन्होंने भारत के लोगों से ब्रिटिश सरकार के खिलाफ सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का आह्वान किया।
भारत छोड़ो आंदोलन ने पूरे भारत में भारी जन आंदोलन को जन्म दिया। लोगों ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ हड़तालें, प्रदर्शन और तोड़फोड़ की। इस आंदोलन में महिलाओं और युवाओं ने भी बड़ी संख्या में भाग लिया।

ब्रिटिश सरकार ने इस आंदोलन को दबाने के लिए कठोर दमन का सहारा लिया। हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया और कई लोगों को गोली मार दी गई। लेकिन आंदोलन को रोका नहीं जा सका।
भारत छोड़ो आंदोलन ने ब्रिटिश सरकार को भारत से बाहर निकलने के लिए मजबूर किया। 15 अगस्त, 1947 को भारत को स्वतंत्रता मिली।
भारत छोड़ो आंदोलन के महत्व
भारत छोड़ो आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इस आंदोलन ने ब्रिटिश सरकार को यह समझा दिया कि भारत को स्वतंत्रता मिलने का समय आ गया है। इस आंदोलन ने भारतीय लोगों के मन में स्वतंत्रता की भावना को और मजबूत किया।
भारत छोड़ो आंदोलन के परिणाम
भारत छोड़ो आंदोलन के निम्नलिखित परिणाम हुए:
  • ब्रिटिश सरकार को भारत से बाहर निकलने के लिए मजबूर होना पड़ा।
  • भारत को 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता मिली।
  • भारतीय लोगों के मन में स्वतंत्रता की भावना को और मजबूत हुआ।
  • भारत में राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बढ़ावा मिला।

चंपारण सत्याग्रह (1917-1918):

चंपारण सत्याग्रह, भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना थी। यह महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत में किया गया पहला सत्याग्रह आंदोलन था। इस आंदोलन में, बिहार के चंपारण जिले के किसानों ने ब्रिटिश सरकार और जमींदारों के खिलाफ अपने शोषण के खिलाफ लड़ाई लड़ी।

चंपारण जिले के किसानों को ब्रिटिश सरकार और जमींदारों द्वारा बहुत सताया जाता था। उन्हें नील की खेती करने के लिए मजबूर किया जाता था, जो एक बहुत ही हानिकारक फसल थी। किसानों को नील की खेती के लिए बहुत कम पैसे मिलते थे, और उन्हें अक्सर जमींदारों द्वारा शोषण किया जाता था।
1917 में, राजकुमार शुक्ला नाम के एक किसान ने महात्मा गांधी से मदद मांगी। गांधीजी ने चंपारण जिले का दौरा किया और किसानों की समस्याओं को देखा। उन्होंने किसानों को एकजुट होने और उनके अधिकारों के लिए लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया।
गांधीजी के नेतृत्व में, किसानों ने कई विरोध प्रदर्शन और हड़तालें कीं। उन्होंने नील की खेती करने से इनकार कर दिया और ब्रिटिश सरकार और जमींदारों के खिलाफ लड़ाई लड़ी।
अंततः, गांधीजी के नेतृत्व में किसानों के आंदोलन का असर हुआ। ब्रिटिश सरकार ने किसानों के शोषण को रोकने के लिए कानून बनाए। किसानों को नील की खेती करने से छूट मिली, और उन्हें अधिक न्यायपूर्ण मूल्य मिलना शुरू हो गया।
चंपारण सत्याग्रह भारत के स्वतंत्रता संग्राम के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ था। यह दिखाया कि भारतीय लोग अपने अधिकारों के लिए लड़ने के लिए तैयार थे। इस आंदोलन ने गांधीजी को एक राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित किया, और यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम के लिए एक प्रेरणा थी।
चंपारण सत्याग्रह के कारण:
  • बिहार के चंपारण जिले के किसानों को ब्रिटिश सरकार और जमींदारों द्वारा बहुत सताया जाता था।
  • किसानों को नील की खेती करने के लिए मजबूर किया जाता था, जो एक बहुत ही हानिकारक फसल थी।
  • किसानों को नील की खेती के लिए बहुत कम पैसे मिलते थे, और उन्हें अक्सर जमींदारों द्वारा शोषण किया जाता था।
चंपारण सत्याग्रह के परिणाम:
  • ब्रिटिश सरकार ने किसानों के शोषण को रोकने के लिए कानून बनाए।
  • किसानों को नील की खेती करने से छूट मिली, और उन्हें अधिक न्यायपूर्ण मूल्य मिलना शुरू हो गया।
  • गांधीजी को एक राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित किया गया।
  • यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम के लिए एक प्रेरणा थी।

गांधीजी के आंदोलनों ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को मजबूत किया और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के साथ साथ अहिंसक आपत्कालीन आंदोलनों की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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